वैश्विक दक्षिण पर संरचनात्मक समायोजनों का प्रभाव और जवाबदेही की आवश्यकता 

पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • 1980 के दशक में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक ने वैश्विक दक्षिण को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए शर्तें लगाईं।
    • दशकों बाद, इस क्षेत्र के कई देश कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों और उच्च स्तर की गरीबी का सामना कर रहे हैं।

परिचय

  • BMJ ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित एक हालिया शोधपत्र में तर्क दिया गया कि जिन संस्थानों ने इन कार्यक्रमों को लागू किया था, अब उन्हें क्षतिपूर्ति देनी चाहिए।
  • 1970 के दशक में वैश्विक दक्षिण: 1960 से 1980 के बीच एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में वास्तविक प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई।
    • जो देश हाल ही में औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुए थे, वे सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश कर रहे थे।
  • 1980 का दशक: 1980 के दशक में IMF और विश्व बैंक ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम (SAPs) शुरू किए।
    • दशकों बाद भी कई देश कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों, स्थिर आय और उच्च गरीबी स्तर से संघर्ष कर रहे हैं।

 वैश्विक दक्षिण

  • “वैश्विक दक्षिण” शब्द का प्रयोग अमेरिकी राजनीतिक कार्यकर्ता कार्ल ओग्लेस्बी ने 1969 में किया।
    • उन्होंने इस शब्द का उपयोग उन देशों के लिए किया जो वैश्विक उत्तर के विकसित देशों द्वारा राजनीतिक और आर्थिक शोषण का सामना कर रहे थे।
  • सरलतम अर्थ में, वैश्विक दक्षिण एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ओशिनिया के देशों को संदर्भित करता है।
    • इन देशों में विश्व की लगभग 85% जनसंख्या रहती है, जिन्होंने औपनिवेशिक शासन का अनुभव किया और औद्योगिकीकरण में ऐतिहासिक रूप से पिछड़े रहे।
  • संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) के अनुसार, वैश्विक दक्षिण के देशों में सामान्यतः निम्न विकास स्तर, उच्च आय असमानता, तीव्र जनसंख्या वृद्धि, कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था, निम्न जीवन गुणवत्ता, कम जीवन प्रत्याशा एवं बाहरी निर्भरता अधिक होती है।

संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम (SAPs)

  • SAPs आर्थिक सुधार उपाय थे जिन्हें IMF और विश्व बैंक ने 1980 और 1990 के दशक में ऋण संकट का सामना कर रहे विकासशील देशों पर लागू किया।
  • SAPs में सामान्यतः तीन प्रमुख सुधार शामिल थे:
    • मितव्ययिता उपाय: स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य सब्सिडी और सामाजिक कल्याण पर सार्वजनिक व्यय में कटौती। उद्देश्य था बाहरी ऋण एवं लेनदारों को भुगतान हेतु बचत को मोड़ना।
    • निजीकरण: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और सेवाओं को निजी हाथों में सौंपना। इसमें उपयोगिताएँ, परिवहन, बैंकिंग और अन्य राज्य-स्वामित्व वाली उद्योगों का निजीकरण शामिल था।
    • आर्थिक उदारीकरण और विनियमन हटाना: औद्योगिक नियमों, शुल्कों, श्रम सुरक्षा और पूंजी नियंत्रणों को हटाना। घरेलू बाज़ारों को विदेशी व्यापार और निवेश के लिए खोलना।
  • देशों की सौदेबाज़ी शक्ति बहुत सीमित थी क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय ऋणों पर चूक उन्हें वैश्विक वित्तीय बाज़ारों से अलग-थलग कर सकती थी।

SAPs का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

  • आर्थिक वृद्धि में मंदी: SAPs से पहले वैश्विक दक्षिण की औसत वार्षिक वृद्धि लगभग 3.2% थी।
    • 1980–1990 के SAPs काल में यह घटकर लगभग 0.7% रह गई।
    • इस अवधि में दक्षिण ने सामूहिक रूप से संभावित राष्ट्रीय आय में औसतन $480 अरब प्रति वर्ष खो दिया।
  • आय में गिरावट: लैटिन अमेरिका में 1980 के बाद प्रति वयस्क वास्तविक आय में उल्लेखनीय गिरावट आई और दशकों बाद ही सुधार हुआ।
  • उप-सहारा अफ्रीका ने दीर्घकालिक आय गिरावट और ठहराव का अनुभव किया।
  • गरीबी और खाद्य असुरक्षा में वृद्धि: व्यापार उदारीकरण और मुद्रा अवमूल्यन ने आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ा दीं।
  • स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव: SAPs ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को गंभीर रूप से प्रभावित किया क्योंकि:
    • स्वास्थ्य पर सरकारी व्ययी घटा,
    • अस्पताल और क्लीनिक बंद हुए,
    • डॉक्टरों और नर्सों की भर्ती कम हुई,
  • आयातित दवाएँ मुद्रा अवमूल्यन के कारण महँगी हो गईं।
  • अध्ययनों ने SAPs को उच्च बाल मृत्यु दर, मातृ मृत्यु में वृद्धि, पोषण और रोग नियंत्रण में गिरावट से जोड़ा।
  • पूंजी पलायन और वित्तीय बहिर्वाह: पूंजी नियंत्रण हटने से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ लाभ विदेश ले गईं।
  • व्यापार उदारीकरण और कमजोर वित्तीय नियंत्रण ने कर चोरी और अवैध बहिर्वाह को आसान बनाया।
  • इससे घरेलू विकास और कल्याण हेतु उपलब्ध धनराशि कम हो गई।

SAPs की आलोचना

  • मानव विकास की तुलना में ऋण भुगतान को प्राथमिकता दी गई।
  • असमानता और गरीबी बढ़ी।
  • राज्य की क्षमता कमजोर हुई।
  • विकासशील देशों की नीतिगत संप्रभुता घट गई।
  • विकसित देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को बढ़ावा मिला।
  • IMF और विश्व बैंक की शासन संरचना की भी आलोचना हुई क्योंकि:
  • विकसित देशों के पास असमान मतदान शक्ति है।
  • वैश्विक उत्तर निर्णय-निर्धारण पर हावी है।
  • IMF में अमेरिका के पास वीटो प्रभाव है।

जवाबदेही पर परिचर्चा

  • हालिया परिचर्चाओं में तर्क दिया गया कि IMF और विश्व बैंक को SAPs द्वारा उत्पन्न आर्थिक एवं सामाजिक क्षति की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।
  • प्रस्तावित उपायों में शामिल हैं:
  • आय और कल्याण की हानि के लिए क्षतिपूर्ति,
  • स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश की पुनर्बहाली,
  • मितव्ययिता और पूंजी बहिर्वाह से हुई हानियों का आकलन,
  • वैश्विक वित्तीय संस्थानों का लोकतंत्रीकरण।
  • हालाँकि, कानूनी जवाबदेही कठिन है क्योंकि इन संस्थानों को संप्रभु प्रतिरक्षा प्राप्त है।

निष्कर्ष

  • संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रमों ने वैश्विक दक्षिण के कई देशों के विकास पथ में बड़ा बदलाव किया।
  • यद्यपि इनका उद्देश्य अर्थव्यवस्थाओं को स्थिर करना और ऋण भुगतान सुनिश्चित करना था, SAPs ने मितव्ययिता, निजीकरण एवं विनियमन हटाने के माध्यम से दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयाँ उत्पन्न कीं।
  • वर्तमान परिचर्चाएँ वैश्विक वित्तीय शासन में सुधार, विकासशील देशों के लिए नीतिगत स्वायत्तता सुनिश्चित करने और अधिक न्यायसंगत अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था बनाने पर केंद्रित हैं।

स्रोत: TH

 

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